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वैभव लक्ष्मी व्रत कब से शुरू करें 2022 में? पूजन विधि व सम्पूर्ण जानकारी

हिन्दू धर्म में माता लक्ष्मी का अनेक रूप में पूजन किया जाता है। कोई धन लक्ष्मी के रूप में, तो कोई वैभव लक्ष्मी के रुप में माता लक्ष्मी की आराधना करता है। कई स्थानों पर माता लक्ष्मी को गज लक्ष्मी और संतान लक्ष्मी के रूप में भी पूजा जाता है। हमारी संस्कृति में न केवल पूजन अपितु कई तरह के उपवास/व्रत भी रखे जाते हैं। इसी प्रकार से एक व्रत है “वैभव लक्ष्मी व्रत”, आज हम इसके बारे में आपको बताएंगे कि वैभव लक्ष्मी व्रत कब से शुरू करें 2022 में, पूजन विधि, कथा, उद्यापन विधि एवं नियम।

2022 में कब से शुरू करें मां वैभव लक्ष्मी व्रत

माता वैभव लक्ष्मी का व्रत शुक्रवार को किया जाता है। ऐसा मन जाता हैं की शुक्रवार का दिन देवियों का होता हैं इस दिन विधि विधान से माता लक्ष्मी का पूजन करने से माता लक्ष्मी का आशीर्वीद प्राप्त होता हैं। शुक्रवार के दिन आप संकल्प ले की आप कितने व्रत करेगी। आप 9,11, या 21 व्रत करने का संकल्प इच्छा अनुसार कर सकती हैं।

वैभव लक्ष्मी व्रत की पूजन विधि

शुक्रवार को शाम के समय स्नान करें। स्नान के बाद पूर्व दिशा में चौकी लगा कर उस पर लाल कपडा बिछाये। उस पर माता लक्ष्मी की मूर्ति स्थापित करें, माँ लक्ष्मी के पास में श्री यंत्र रखे। माता लक्ष्मी को श्वेत रंग अति प्रिय हैं अतः पूजन करते समय सफ़ेद वस्त्र पहने। श्वेत पुष्प और श्वेत फलो का भोग लगाए। माँ वैभव लक्ष्मी के व्रत में चावल से बनाई गयी खीर का भोग अवश्य लगाए। पूजन करने के बाद कथा का पथ अवश्य करें। संकल्प किये गए व्रतों के बाद व्रत का उद्यापन कर व्रत को पूरा करा।

वैभव लक्ष्मी व्रत कथा

किसी शहर में लाखों लोग रहते थे। सभी अपने-अपने कामों में रत रहते थे। किसी को किसी की परवाह नहीं थी। भजन-कीर्तन, भक्ति-भाव, दया-माया, परोपकार जैसे संस्कार कम हो गए। शहर में बुराइयां बढ़ गई थीं। शराब, जुआ, रेस, व्यभिचार, चोरी-डकैती वगैरह बहुत से गुनाह शहर में होते थे। इनके बावजूद शहर में कुछ अच्छे लोग भी रहते थे। ऐसे ही लोगों में शीला और उनके पति की गृहस्थी मानी जाती थी। शीला धार्मिक प्रकृति की और संतोषी स्वभाव वाली थी। उनका पति भी विवेकी और सुशील था। शीला और उसका पति कभी किसी की बुराई नहीं करते थे और प्रभु भजन में अच्छी तरह समय व्यतीत कर रहे थे। शहर के लोग उनकी गृहस्थी की सराहना करते थे। देखते ही देखते समय बदल गया। शीला का पति बुरे लोगों से दोस्ती कर बैठा। अब वह जल्द से जल्द करोड़पति बनने के ख्वाब देखने लगा। इसलिए वह गलत रास्ते पर चल पड़ा। उसकी हालत रास्ते पर भटकते भिखारी जैसी हो गई थी। शराब, जुआ, रेस, चरस-गांजा वगैरह बुरी आदतों में शीला का पति भी फंस गया। दोस्तों के साथ उसे भी शराब की आदत हो गई। इस प्रकार उसने अपना सब कुछ रेस-जुएं में गवां दिया।

शीला को पति के बर्ताव से बहुत दुःख हुआ, किंतु वह भगवान पर भरोसा कर सबकुछ सहने लगी। वह अपना अधिकांश समय प्रभु भक्ति में बिताने लगी। अचानक एक दिन दोपहर को उनके द्वार पर किसी ने दस्तक दी। शीला ने द्वार खोला तो देखा कि एक मांजी खड़ी थी। उसके चेहरे पर अलौकिक तेज निखर रहा था। उनकी आंखों में से मानो अमृत बह रहा था। उसका भव्य चेहरा करुणा और प्यार से छलक रहा था। उसको देखते ही शीला के मन में अपार शांति छा गई। शीला के रोम-रोम में आनंद छा गया। शीला उस मांजी को आदर के साथ घर में ले आई। घर में बिठाने के लिए कुछ भी नहीं था। अतः शीला ने सकुचाकर एक फटी हुई चद्दर पर उसको बिठाया। मांजी बोलीं- क्यों शीला! मुझे पहचाना नहीं? हर शुक्रवार को लक्ष्मीजी के मंदिर में भजन-कीर्तन के समय मैं भी वहां आती हूं।’ इसके बावजूद शीला कुछ समझ नहीं पा रही थी। फिर मांजी बोलीं- ‘तुम बहुत दिनों से मंदिर नहीं आईं अतः मैं तुम्हें देखने चली आई।’

मांजी के अति प्रेम भरे शब्दों से शीला का हृदय पिघल गया। उसकी आंखों में आंसू आ गए और वह बिलख-बिलखकर रोने लगी। मांजी ने कहा- ‘बेटी! सुख और दुःख तो धूप और छांव जैसे होते हैं। धैर्य रखो बेटी! मुझे तेरी सारी परेशानी बता।’ मांजी के व्यवहार से शीला को काफी संबल मिला और सुख की आस में उसने मांजी को अपनी सारी कहानी कह सुनाई। कहानी सुनकर मांजी ने कहा- ‘कर्म की गति न्यारी होती है। हर इंसान को अपने कर्म भुगतने ही पड़ते हैं। इसलिए तू चिंता मत कर। अब तू कर्म भुगत चुकी है। अब तुम्हारे सुख के दिन अवश्य आएंगे। तू तो मां लक्ष्मीजी की भक्त है। मां लक्ष्मीजी तो प्रेम और करुणा की अवतार हैं। वे अपने भक्तों पर हमेशा ममता रखती हैं। इसलिए तू धैर्य रखकर मां लक्ष्मी जी का व्रत कर। इससे सब कुछ ठीक हो जाएगा।’ शीला के पूछने पर मांजी ने उसे व्रत की सारी विधि भी बताई। मांजी ने कहा- ‘बेटी! मां लक्ष्मीजी का व्रत बहुत सरल है। उसे ‘वरदलक्ष्मी व्रत’ या ‘वैभव लक्ष्मी व्रत’ कहा जाता है। यह व्रत करने वाले की सब मनोकामना पूर्ण होती है। वह सुख-संपत्ति और यश प्राप्त करता है।’

शीला यह सुनकर आनंदित हो गई। शीला ने संकल्प करके आंखें खोली तो सामने कोई न था। वह विस्मित हो गई कि मांजी कहां गईं? शीला को तत्काल यह समझते देर न लगी कि मांजी और कोई नहीं साक्षात्‌ लक्ष्मीजी ही थीं। दूसरे दिन शुक्रवार था। सवेरे स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनकर शीला ने मांजी द्वारा बताई विधि से पूरे मन से व्रत किया। आखिरी में प्रसाद वितरण हुआ। यह प्रसाद पहले पति को खिलाया। प्रसाद खाते ही पति के स्वभाव में फर्क पड़ गया। उस दिन उसने शीला को मारा नहीं, सताया भी नहीं। शीला को बहुत आनंद हुआ। उनके मन में ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ के लिए श्रद्धा बढ़ गई।शीला ने पूर्ण श्रद्धा-भक्ति से इक्कीस शुक्रवार तक ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ किया। इक्कीसवें शुक्रवार को मांजी के कहे मुताबिक उद्यापन विधि कर के सात स्त्रियों को ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ की सात पुस्तकें उपहार में दीं। फिर माताजी के ‘धनलक्ष्मी स्वरूप’ की छवि को वंदन करके भाव से मन ही मन प्रार्थना करने लगीं- ‘हे मां धनलक्ष्मी! मैंने आपका ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ करने की मन्नत मानी थी, वह व्रत आज पूर्ण किया है। हे मां! मेरी हर विपत्ति दूर करो। हमारा सबका कल्याण करो। जिसे संतान न हो, उसे संतान देना। सौभाग्यवती स्त्री का सौभाग्य अखंड रखना। कुंवारी लड़की को मनभावन पति देना। जो आपका यह चमत्कारी वैभव लक्ष्मी व्रत करें, उनकी सब विपत्ति दूर करना। सभी को सुखी करना। हे मां आपकी महिमा अपार है।’ ऐसा बोलकर लक्ष्मीजी के ‘धनलक्ष्मी स्वरूप’ की छवि को प्रणाम किया। व्रत के प्रभाव से शीला का पति अच्छा आदमी बन गया और कड़ी मेहनत करके व्यवसाय करने लगा। उसने तुरंत शीला के गिरवी रखे गहने छुड़ा लिए। घर में धन की बाढ़ सी आ गई। घर में पहले जैसी सुख-शांति छा गई। ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ का प्रभाव देखकर मोहल्ले की दूसरी स्त्रियां भी विधिपूर्वक ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ करने लगीं।

वैभव लक्ष्मी व्रत उद्यापन विधि

माता वैभव लक्ष्‍मी व्रत किये गए संकल्प के अनुसार सात, ग्यारह या इक्कीस शुक्रवारों तक यह व्रत पूरी श्रद्धा तथा भावना के साथ करना चाहिए। आखिरी शुक्रवार को इसका शास्त्रीय विधि के अनुसार उद्यापन करना चाहिए। आखिरी शुक्रवार को माता लक्ष्मी को भोग लगाए। जिस प्रकार हर शुक्रवार को पूजन करती हैं ठीक उसी प्रकार अंतिम शुक्रवार को भी पूजन करे, पूजन के पश्च्यात मां लक्ष्मी के सामने एक श्रीफल फोड़ें फिर कम से कम सात‍ कुंआरी कन्याओं या सौभाग्यशाली स्त्रियों को कुमकुम का तिलक लगाकर मां वैभवलक्ष्मी व्रत कथा की पुस्तक की एक-एक प्रति उपहार में दे, और सबको खीर का प्रसाद दे। इसके बाद मां लक्ष्मीजी को श्रद्धा सहित प्रणाम करना चाहिए। फिर माताजी के ‘धनलक्ष्मी स्वरूप’ की छबि को वंदन करके भाव से मन ही मन प्रार्थना करें- ‘हे मां धनलक्ष्मी! मैंने आपका ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ करने का संकल्प लिया था , वह व्रत आज पूर्ण किया है। हे मां हमारी मनोकामना पूर्ण करें। हमारी हर विपत्ति दूर करो। हमारा सबका कल्याण करो। जिसे संतान न हो, उसे संतान देना। सौभाग्यवती स्त्री का सौभाग्य अखंड रखना। कुंआरी लड़की को मनभावन पति देना। जो आपका यह चमत्कारी वैभवलक्ष्मी व्रत करे, उनकी सब विपत्ति दूर करना। सभी को सुखी करना। हे मां आपकी महिमा अपार है।’ आपकी जय हो! ऐसा बोलकर लक्ष्मीजी के ‘वैभव लक्ष्मी स्वरूप’ को प्रणाम करें।

वैभव लक्ष्मी के नियम

व्रत को परेशान या दुखी हो कर नहीं करना चाहिए, जब भी माँ वैभव लक्ष्मी का व्रत करे; पूरी श्रद्धा भक्ति से करें।पूजा में श्री यंत्र का होना आवश्यक है, श्री यंत्र के बिना व्रत अधूरा होता हैं। पूजन में साफ सफाई का ध्यान रखे जहा सफाई नहीं होती वह माँ लक्ष्मी निवास नहीं करती। जब माँ वैभव लक्ष्मी का पूजन करे तब मूर्ति के सामने जल से भरा हुआ तांबे का कलश अवश्य रखे। माँ लक्ष्मी को सफ़ेद रंग अत्यंत प्रिय हैं तो जब भी आप पूजा करे सफ़ेद व्रत धारण करें। माँ वैभव लक्ष्मी के व्रत में गाय के दूध और चावल की खीर का भोग लगाए। पूजन करने क बाद व्रत कथा अवश्य सुने। भोग लगाई गयी खीर को प्रसाद के रूप में सभी को वितरित करने के बाद ही आप खाए।

निष्कर्ष:

तो ये थी वैभव लक्ष्मी व्रत की महिमा, इसकी कथा, नियम एवं उद्यापन विधि। साथ ही हमने आपको यह भी बताया कि वैभव लक्ष्मी व्रत कब से शुरू करें 2022 में। उम्मीद है आपको यह जानकारी अच्छी लगी एवं आप इसे आगे शेयर करेंगे।

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